प्रदोष व्रत: विधि, कथा और नियम

भगवान शिव और माता पार्वती · हर पक्ष की त्रयोदशी, शाम का प्रदोष काल

प्रदोष व्रत भगवान शिव को समर्पित है और हर महीने दोनों पक्षों की त्रयोदशी को आता है। इसकी पूजा शाम को सूर्यास्त के आसपास, प्रदोष काल में होती है। सोमवार को पड़ने वाला सोम प्रदोष और शनिवार को पड़ने वाला शनि प्रदोष ख़ास माने जाते हैं।

गिनती हम रखेंगे: कितने हुए, अगली तारीख, उद्यापन का दिन। मुफ़्त।अपनी गिनती शुरू करें →

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अगला शुक्ल पक्ष लगभग शुरू: मंगलवार, 10 नवंबर

व्रत विधि

  1. सुबह नहाकर शिव जी के सामने संकल्प लें और दिन भर उपवास रखें।
  2. शाम को सूर्यास्त से पहले फिर नहाएँ या हाथ-मुँह धोकर साफ़ कपड़े पहनें।
  3. प्रदोष काल में शिवलिंग पर जल, दूध, दही, शहद और बेलपत्र चढ़ाएँ।
  4. दीया जलाकर 'ॐ नमः शिवाय' का जाप करें और प्रदोष कथा सुनें।
  5. आरती करके प्रसाद बाँटें, फिर फलाहार या सादा भोजन करें।

आम नियम

  • कई लोग दिन भर फलाहार पर रहते हैं और पूजा के बाद भोजन करते हैं।
  • पूजा का सबसे अच्छा समय प्रदोष काल माना जाता है, जो सूर्यास्त के आसपास लगभग डेढ़ घंटे का होता है।
  • बहुत से लोग उस दिन अनाज और नमक से परहेज़ करते हैं।

व्रत कथा

चंद्र देव का विवाह दक्ष प्रजापति की सत्ताईस बेटियों से हुआ था। उनमें से वे रोहिणी को सबसे ज़्यादा चाहते थे और ज़्यादातर समय उसी के साथ बिताते थे। बाकी बहनों को अकेलापन लगा और उन्होंने पिता से बात की। दक्ष ने चंद्रमा से सबके साथ बराबर व्यवहार करने को कहा, पर चंद्रमा का व्यवहार नहीं बदला।

इसके बाद चंद्रमा बीमार पड़ने लगे। उनकी चमक दिन-ब-दिन घटने लगी और वे कमज़ोर होते गए। देवता चिंतित हुए, और नारद मुनि ने उन्हें भगवान शिव की आराधना करने की सलाह दी।

चंद्रमा ने गहरी श्रद्धा से शिव जी की पूजा की। त्रयोदशी के दिन, शाम के शांत समय में, शिव जी प्रसन्न हुए और उन्हें नया जीवन दिया। शिव जी ने चंद्रमा को अपने मस्तक पर धारण किया, इसलिए वे चंद्रशेखर कहलाते हैं। चंद्रमा की रोशनी लौट आई, और उसका घटना-बढ़ना आज भी उसी कृपा की याद है।

क्योंकि शिव जी की यह कृपा शाम के समय मिली, इसलिए त्रयोदशी का प्रदोष काल उनकी पूजा का ख़ास समय माना जाता है।

कथा हमारे अपने शब्दों में, परंपरा से चली आ रही कहानी पर आधारित।

उद्यापन

11 या 26 प्रदोष पूरे होने पर कई परिवार उद्यापन करते हैं। शिव-पार्वती की पूजा, हवन, और ब्राह्मण या गरीब को भोजन व दान आम है। कई लोग इसके लिए किसी सोम या शनि प्रदोष को चुनते हैं।

सवाल-जवाब

प्रदोष व्रत कितने रखे जाते हैं?
बहुत से लोग 11 या 26 प्रदोष का संकल्प लेते हैं, फिर उद्यापन करते हैं। कुछ लोग नियमित रूप से रखते रहते हैं। परिवारों की परंपराएँ अलग हैं।
प्रदोष काल कब होता है?
आमतौर पर सूर्यास्त से लगभग 45 मिनट पहले से 45 मिनट बाद तक। आपके शहर का सही समय पंचांग में देखें।
कोई प्रदोष छूट जाए तो?
कई परिवार बस अगले प्रदोष से जारी रखते हैं। पहले की गिनती बनी रहती है। आप जैसा ठीक समझें।
गिनती हम रखेंगे: कितने हुए, अगली तारीख, उद्यापन का दिन। मुफ़्त।अपनी गिनती शुरू करें →

यह जानकारी अभी पंडित जी की समीक्षा में है। परंपराएँ परिवार और क्षेत्र के हिसाब से अलग होती हैं।