ज्योतिष का पाठ्यक्रम
पाँच छोटे अध्याय। न डर बेचना, न रत्न, न कठिन शब्द बिना समझाए। जो परंपरा सच में कहती है, वही — जैसे कोई अच्छा गुरु समझाता है।
पहली बार क्रम में पढ़िए। हर अध्याय पिछले पर बना है: भाव जीवन के मंच देते हैं, राशियाँ उन मंचों को एक मूड देती हैं, ग्रह पात्र लेकर आते हैं, और नक्षत्र भावनात्मक रंग जोड़ते हैं।
आख़िरी अध्याय दोषों पर है — मंगल, काल सर्प, साढ़े साती। यह इसलिए है कि दशकों से इन शब्दों का उपयोग डर बेचने के लिए किया गया है। हम बताएँगे कि इनका असल मतलब क्या है, और सच में क्या काम आता है।
हर अध्याय के अंत में एक गतिविधि है — अपनी कुंडली पर एक छोटा-सा प्रयोग। नीचे दी हुई कोरी कुंडली छाप लीजिए और साथ-साथ कीजिए।
जीवन के बारह अध्याय। हर भाव कुछ माँगता है।
पढ़िए →आसमान के मूड। अग्नि, पृथ्वी, वायु, जल — और कौन इनका स्वामी है।
पढ़िए →सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि, राहु, केतु — हर एक क्या है।
पढ़िए →चंद्रमा के 27 विश्रामस्थल। आपकी भावनात्मक पहचान यहीं बसती है।
पढ़िए →मंगल, काल सर्प, साढ़े साती। परंपरा असल में क्या कहती है, और क्या नहीं।
पढ़िए →बार-बार लौटने वाली सामग्री। हाथ से भरने वाली सामग्री भी।
ऊपर पढ़ी हर बात अपनी कुंडली में देखते ही असली हो जाती है।
अपनी कुंडली बनाएँ